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सीरिया पर अमरीका और तुर्की के बीच गहराता मतभेद

सीरिया पर अमरीका और तुर्की के बीच गहराता मतभेद
10 Jan
1:17

अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने 19 दिसम्बर 2018 को अचानक एलान कर दिया कि वह सीरिया से अमरीकी सैनिकों को वापस बुला रहे हैं।

उन्होंने दाइश को परास्त करने का दावा करते हुए कहा कि अब सीरिया में बने रहने की कोई वजह नहीं है।

अमरीका के इस एलान का तुर्की ने स्वागत किया। तुर्क राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोग़ान ने एक तो अमरीका द्वारा समर्थित कुर्दों पर हमले की धमकी दी और दूसरी तरफ़ अमरीका से वादा किया कि वह दाइश के विरुद्ध युद्ध जारी रखेगा। इन दो कारणों से अमरीका अपनी सेना सीरिया से बाहर निकालने पर तैयार हुआ।

अमरीका में कुछ टीकाकारों ट्रम्प की आलोचना करते हुए हैं कि उन्होंने तुर्की को खुश करने के लिए सेना बाहर निकालने का फ़ैसला किया है।

बहरहाल बाद में अमरीकी अधिकारियों के यह बयान आए कि वह चरणबद्ध रूप से सीरिया से अपने सैनिकों को बाहर निकालेंगे। अमरीका के राष्ट्रीय सुरक्ष सलाहकार जान बोल्टन ने कहा कि सीरिया से अमरीका के सैनिक तब निकलेंगे जब दाइश को पूरी तरह पराजय हो जाएगी और तुर्की यह वादा कर लेगा कि वह कुर्दों की रक्षा करेगा। इस बयान पर तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोगान ने बोल्टन से मुलाक़ात करने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि बोल्टन ने बहुत भयानक ग़लती की है।

अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प भी सेना निकालने के अपने स्टैंड से पीछे हट गए हैं। 2 जनवरी को ट्रम्प ने कहा कि सेना निकाल लेने के बाद भी हम कुर्दों का समर्थन करते रहेंगे। ट्रम्प पहले तो कह चुके थे कि दाइश को परास्त किया जा चुका है अतः अब सीरिया में अमरीकी सैनिकों के बाक़ी रहने का कोई औचित्य नहीं रह जाता मगर अब ट्रम्प अब नया बहाना पेश कर रहे हैं।

अमरीका को अच्छी तरह पता है कि सीरिया में वह जिस उद्देश्य से घुसा था वह पूरी तरह नाकाम हो चुका है और भविष्य में भी उसे कोई सफलता मिलने वाली नहीं है लेकिन सीरिया से सेना निकालने की घोषणा के बाद उन गुटों और सरकारों में गहरी निराशा देखने में आ रही है जिन्होंने अमरीका पर भरोस किया था। सीरिया के कुर्द संगठनों ने कहा कि अमरीका ने हमारी पीठ में छुरा घोंप दिया है। अमरीका इस कोशिश में है कि इस स्थिति को देखकर कहीं उसके दूसरे घटक भी उससे दूर न हो जाएं इसलिए वह यह ज़ाहिर करने की कोशिश कर रहा है कि अमरीका को अपने घटकों की चिंता है।

मगर सवाल यह है कि क्या अमरीका के घटक उसके रवैए को देखते हुए उस पर भरोसा करेंगे?

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